Tuesday, June 16, 2026

योगा प्रोटोकाल 21 जून 2026


योगा प्रोटोकॉल 21 जून 2026


योग क्या है?

सार रूप में कहें तो योग आध्यात्मिक अनुशासन एवं अत्यंत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित ज्ञान है जो मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। यह स्वस्थ जीवन की कला एवं विज्ञान है।

संस्कृत वाड्मय के अनुसार योग शब्द युज् धातु में घञ् प्रत्यय लगने से निष्पन्न हुआ है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार यह तीन अर्थों में प्रयुक्त होता है।

(1.)- युज् समाधौ = समाधि

(2.)- युजिर योगे = जोड़

(3)- युज् संयमने = सामंजस्य।

यौगिक ग्रंथों के अनुसार, योग अभ्यास व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना के साथ एकाकार कर देता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह परमाणु का प्रकटीकरण मात्र है। जिसने योग में इस अस्तित्व के एकत्व का अनुभव कर लिया है, उसे योगी कहा जाता है, योगी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर मुक्तावस्था को प्राप्त करता है। इसे ही मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य या मोक्ष कहा जाता है ।

‘‘योग’’ का प्रयोग आंतरिक विज्ञान के रूप में भी किया जाता है, जो विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं का सम्मिलन है, जिसके माध्यम से मनुष्य शरीर एवं मन के बीच सामंजस्य स्थापित कर आत्म साक्षात्कार करता है। योग अभ्यास (साधना) का उद्देश्य सभी त्रिविध प्रकार के दुखों से आत्यन्तिक निवृत्ति प्राप्त करना है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति जीवन में पूर्ण स्वतंत्रता तथा स्वास्थ्य, प्रसन्नता एवं सामंजस्य का अनुभव कर सके।





योग का संक्षिप्त इतिहास एवं विकास

योग विद्या का उद्भव हजारों वर्ष प्राचीन है।

सतों और ऋषियों ने इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योग विद्या को एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका एवं दक्षिण अमेरिका सहित विश्व के अलग-अलग भागों में प्रसारित किया। दिलचस्प है कि, आधुनिक विद्वानों ने सम्पूर्ण पृथ्वी की प्राचीन संस्कृतियों में मिलने वाली समानता को रेखांकित किया है तथा वह इससे अचंभित है। हालाँकि, भारत में, योग प्रणाली पूर्ण रूप से विकसित थी।

भारतीय उपमहाद्वीपों में भ्रमण करने वाले अगस्त्य मुनि ने इस योग संस्कृति का जीवन के रूप में विश्व के प्रत्येक भाग में प्रसारित किया।

योग का व्यापक स्वरूप तथा उसका परिणाम सिंधु एवं सरस्वती नदी घाटी सभ्यताओं 2700 ई.पू.- की अमर संस्कृति का प्रतिफलन माना जाता है। योग ने मानवता के मूर्त और आध्यात्मिक दोनों रूपों को महत्त्वपूर्ण बनाकर स्वयं को सिद्ध किया है। सिंधु सरस्वती घाटी सभ्यता में योग साधना करती अनेक आकृतियों के साथ प्राप्त ढेरों मुहरें एवं जीवाश्म अवशेष इस बात के प्रमाण हैं कि प्राचीन भारत में योग का अस्तित्व था। सरस्वती घाटी सभ्यता में प्राप्त देवी-एवं देवताओं की मूर्तियां एव मुहरें तंत्र योग का संकेत करती हैं। वैदिक एवं उपनिषद् परंपरा, शैव, वैष्णव तथा तांत्रिक परंपरा, भारतीय दर्शन, रामायण एवं भगवद्गीता समेत महाभारत जैसे महाकाव्यों, बौद्ध एवं जैन परंपरा के साथ-साथ विश्व की लोक विरासत में भी योग मिलता है। योग का अभ्यास पूर्व वैदिक काल में भी किया जाता था। महर्षि पतंजलि ने उस समय के प्रचलित प्राचीन योग अभ्यासों को व्यवस्थित व वर्गीकृत किया और उनके निहितार्थ और इससे संबंधित ज्ञान को पातंजलयोगसूत्र नामक ग्रन्थ में क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित किया।



पतंजलि के बाद भी अनेक ऋषियों एवं योग आचार्यों ने योग अभ्यासों और यौगिक साहित्य के माध्यम से इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रतिष्ठित योग आचार्यों की शिक्षाओं के माध्यम से योग प्राचीन काल से लेकर आज सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित हुआ। आज सभी को योग अभ्यास से व्याधियांे की रोकथाम, अच्छी देखभाल एवं स्वास्थ्य लाभ मिलने का दृढ़ विश्वास है। सम्पूर्ण विश्व में लाखों लोग योग अभ्यासों से लाभान्वित हो रहे हैं। योग दिन-प्रतिदिन विकसित और समृद्ध होता जा रहा है। आज के समय में यौगिक अभ्यास अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।





योग व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, उसके मन, भावनाओं तथा ऊर्जा के स्तर के अनुरूप कार्य करता है । इसे व्यापक रूप से पाँच वर्गों में विभाजित किया गया हैः

ज्ञान योग: बोध के लिए योग

भक्ति योग: मनोभाव संस्कृति के लिए योग

कर्म योग: निष्काम भाव के लिए योग

ध्यान योग: ध्यान के लिए योग

क्रिया योग: जीवनशक्ति के सर्वोत्तम प्रयोग के लिए योग।





प्रत्येक व्यक्ति इन पाँच योग कारकों का एक अद्वितीय संयोग है। केवल एक समर्थ गुरु (अध्यापक) ही योग्य साधक को उसकी आवश्यकतानुसार आधारभूत योग सिद्धांतों का सही संयोजन करा सकता है।

‘‘योग की सभी प्राचीन व्याख्याओं में इस विषय पर अधिक बल दिया गया है कि समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में अभ्यास करना अत्यंत आवश्यक है।’’



पारंपरिक योग सम्प्रदाय

योग के अलग-अलग सम्प्रदायों, परंपराओं, दर्शनों, धर्मों एवं गुरु-शिष्य परंपराओं के चलते भिन्न-भिन्न पारंपरिक पाठशालाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ। इनमें ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, पातंजलयोग, कंुडलिनी योग, हठयोग, ध्यानयोग, मंत्रयोग, लययोग, राजयोग, जैनयोग, बौद्धयोग आदि सम्मिलित हैं। प्रत्येक सम्प्रदायों के अपने अलग दृष्टिकोण और अभ्यासक्रम हैं जिसके माध्यम से प्रत्येक योग सम्प्रदायों ने योग के मूल उद्देश्यों और लक्ष्य तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की है।





योग साधनाओं में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, बंध एवं मुद्रा, षट्कर्म, युक्ताहार, मंत्र-जप, युक्तकर्म आदि साधनाओं का अभ्यास सबसे अधिक किया जाता है । यम प्रतिरोधक एवं नियम अनुपालनीय हैं। इन्हें योग अभ्यासों के लिए पूर्व अपेक्षित एवं अनिवार्य माना गया है। आसन का अभ्यास शरीर एवं मन में स्थायित्व लाने में सक्षम हैं, कुर्यात् तदासनम् स्थैर्यम् अर्थात् आसन का अभ्यास महत्त्वपूर्ण समय सीमा तक मनोदैहिक विधिपूर्वक अलग-अलग करने से स्वयं के अस्तित्व के प्रति दैहिक स्थिति एवं स्थिर जागरूकता बनाए रखने की योग्यता प्रदान करता है।

प्राणायाम श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया का सुव्यवस्थित एवं नियमित अभ्यास है। यह श्वसन प्रक्रिया के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने एवं उसके पश्चात् मन के प्रति सजगता उत्पन्न करने तथा मन पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायता करता है। अभ्यास की प्रारंभिक अवस्था में श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया को सजगतापूर्वक किया जाता है।

प्राणायाम का अभ्यास नासिका, मुख एवं शरीर के अन्य छिद्रों तथा शरीर के आंतरिक एवं बाहरी मार्गांे तक जागरूकता बढ़ाता है। प्राणायाम अभ्यास के दौरान नियमित, नियंत्रित और निरीक्षित प्रक्रिया द्वारा श्वास को शरीर के अन्दर लेना पूरक कहलाता है, नियमित, नियंत्रित और निरीक्षित प्रक्रिया द्वारा श्वास को शरीर के अन्दर रोकने की अवस्था कुंभक तथा नियमित, नियंत्रित और निरीक्षित प्रक्रिया द्वारा श्वास को शरीर के बाहर छोड़ना रेचक कहलाता है।

प्रत्याहार के अभ्यास से व्यक्ति अपनी इंद्रियों के माध्यम से सांसारिक विषय का त्याग कर अपने मन तथा चैतन्य केन्द्र के एकीकरण का प्रयास करता है। धारणा का अभ्यास मनोयोग के व्यापक आधार क्षेत्र के एकीकरण का प्रयास करता है, यह एकीकरण बाद में ध्यान में परिवर्तित हो जाता है। इसी ध्यान में चिंतन (शरीर एवं मन के भीतर केंद्रित ध्यान) एवं स्थिर रहने पर कुछ समय पश्चात् यह समाधि की अवस्था में परिवर्तित हो जाता है।

बंध एवं मुद्रा ऐसे योग अभ्यास हैं, जो प्राणायाम से सम्बन्धित हैं। ये उच्च यौगिक अभ्यास के प्रसिद्ध रूप माने जाते हैं जो मुख्य रूप से नियंत्रित श्वसन के साथ विशेष शारीरिक बंधों एवं विभिन्न मुद्राओं के द्वारा किए जाते हैं। यही अभ्यास आगे चलकर मन पर नियंत्रण स्थापित करता है और उच्चतर यौगिक सिद्धियों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। हालांकि, ध्यान का अभ्यास, जो व्यक्ति को आत्मबोध एवं श्रेष्ठता की ओर ले जाता है, योग साधना पद्धति का सार माना गया है।

शट्कर्म-शरीर एवं मन शोधन का सुव्यवस्थित एवं नियमित अभ्यास है जो शरीर में एकत्रित हुए विषैले पदार्थों को हटाने में सहायता प्रदान करता है। युक्ताहार-स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त सुव्यवस्थित एवं नियमित भोजन का समर्थन करता है ।

मंत्र जप-मंत्रों का चिकित्सकीय पद्धति से उच्चारण ही जप अथवा दिव्य चेतना कहलाता है। मंत्र जप सकारात्मक मानसिक ऊर्जा की सृष्टि करता है जो धीरे-धीरे तनाव से बाहर आने में सहायता करता है।

युक्तकर्म-स्वस्थ जीवन के लिए

युक्तकर्म-स्वस्थ जीवन के लिए सम्यक (उचित) कर्म की प्रेरणा देता है।

योगाभ्यास के लिए सामान्य दिशानिर्देश

योगाभ्यास करते समय योग के अभ्यासी को नीचे दिए गए दिशानिर्देशों एवं सिद्धांतों का पालन अवश्य करना चाहिएः

अभ्यास से पूर्व

Ÿ शौच-शौच का अर्थ है शोधन, यह योग अभ्यास के लिए एक महत्त्वपूर्ण एवं पूर्व अपेक्षित क्रिया है । इसके अन्तर्गत आसपास का वातावरण, शरीर एवं मन की शुद्धि की जाती है ।

Ÿ योग अभ्यास शांत वातावरण में आराम के साथ शरीर एवं मन को शिथिल करके किया जाना चाहिए ।

Ÿ योग अभ्यास खाली पेट अथवा अल्पाहार लेकर करना चाहिए। यदि अभ्यास के समय कमजोरी महसूस हो तो गुनगुने पानी में थोड़ी सी शहद मिलाकर लेना चाहिए।

Ÿ योग अभ्यास मल-मूत्र का विसर्जन करने के उपरान्त प्रारम्भ करना चाहिए।

Ÿ अभ्यास करने के लिए चटाई, दरी, कंबल अथवा योग मैट का प्रयोग करना चाहिए।

Ÿ अभ्यास करते समय शरीर की गतिविधि आसानी से हो, इसके लिए सूती के हल्के और आरामदायक वस्त्र पहनना चाहिए।

Ÿ थकावट, बीमारी, जल्दबाजी एवं विकट तनाव कीे स्थिति में योग नहीं करना चाहिए।

Ÿ यदि पुराने रोग, पीड़ा एवं हृदय संबंधी समस्याएं हों तो ऐसी स्थिति में योग अभ्यास शुरू करने के पूर्व चिकित्सक अथवा योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

Ÿ गर्भावस्था एवं मासिक धर्म के समय योग करने से पहले योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।



अभ्यास के समय Ÿ अभ्यास सत्र प्रार्थना अथवा स्तुति से प्रारम्भ करना चाहिए क्योंकि प्रार्थना अथवा स्तुति मन एवं मस्तिष्क को विश्रांति प्रदान करने के लिए शान्त वातावरण निर्मित करते हैं।

Ÿ योग अभ्यास आरामदायक स्थिति में शरीर एवं श्वास-प्रश्वास की सजगता के साथ धीरे-धीरे प्रारम्भ करना चाहिए।

Ÿ अभ्यास के समय श्वास-प्रश्वास की गति नहीं रोकनी चाहिए, जब तक कि आपको ऐसा करने के लिए विशेष रूप से कहा न जाए।

Ÿ श्वास-प्रश्वास सदैव नासारन्ध्रों से ही लेना चाहिए, जब तक कि आपको अन्य विधि से श्वास-प्रश्वास लेने के लिए न कहा जाए। Ÿ अभ्यास के समय शरीर को कसकर न रखें और अनावश्यक झटका न दें।

Ÿ अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के अनुसार ही योग अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के अच्छे परिणाम आने में कुछ समय लगता है, इसलिए लगातार और नियमित अभ्यास बहुत आवश्यक है।

Ÿ प्रत्येक योग अभ्यास के लिए ध्यातव्य निर्देश एवं सावधानियां तथा सीमाएं होती हैं। ऐसे ध्यातव्य निर्देशों को सदैव अपने मन में रखना चाहिए।

Ÿ योग सत्र का समापन सदैव ध्यान, गहन मौन, संकल्प तथा शांति पाठ इत्यादि से करना चाहिए।



अभ्यास के बाद

Ÿ योगभ्यास के 20-30 मिनट के बाद स्नान करना चाहिए ।

Ÿ योगभ्यास के 20-30 मिनट बाद ही आहार ग्रहण करना चाहिए, उससे पहले नहीं ।

मूलाधार स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्धि आज्ञा सहस्रार



ध्यान देने योग्य विचार

कुछ आहार संबंधी दिशानिर्देश, यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि तन एवं मन ठीक प्रकार से अभ्यास के लिए तैयार हैं। आमतौर पर शाकाहारी आहार ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। 30 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति के लिए बीमारी या अत्यधिक शारीरिक कार्य या श्रम की स्थिति को छोड़कर एक दिन में दो बार भोजन ग्रहण करना पर्याप्त होता है। योग किस प्रकार सहायता कर सकता है?

योग निश्चित रूप से सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति प्रदान करने का साधन है। वर्तमान समय में हुए चिकित्सा शोधों ने योग से होने वाले कई शारीरिक और मानसिक लाभों के रहस्य प्रकट किए हैं। यहीं नहीं लाखों योग अभ्यासियों के अनुभव के आधार पर इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि योग किस प्रकार सहायता कर सकता है।



Ÿ योग शारीरिक स्वास्थ्य, स्नायुतंत्र एवं कंकाल तन्त्र को सुचारु रूप से कार्य करने और हृदय तथा नाड़ियों के स्वास्थ्य के लिए हितकर अभ्यास है ।

Ÿ यह मधुमेह, श्वसन संबंधी विकार, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप और जीवनषैली संबंधी कई प्रकार के विकारों के प्रबंधन में लाभकारी है ।

Ÿ योग अवसाद, थकान, चिंता संबंधी विकार और तनाव को कम करने में सहायक है।

Ÿ योग मासिक धर्म एवं रजोनिवृत्ति संबंधी लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक है।

Ÿ संक्षेप में योग शरीर एवं मन के निर्माण की ऐसी प्रक्रिया है, जो समृद्ध और परिपूर्ण जीवन की उन्नति का मार्ग है, न कि जीवन के अवरोध का।
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